रिपोर्ट: प्रोफेसर गीता सिंह
स्थान: श्रीनगर / नई दिल्ली
हिमालय की गोद में बसी कश्मीर घाटी, जिसे कभी “धरती का स्वर्ग” कहा जाता था, आज जलवायु संकट की चपेट में आ चुकी है। ताजा अध्ययन और आंकड़ों के मुताबिक, पिछले चार दशकों में यहां औसत तापमान में 0.8°C की तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं झीलें, नदियां और झरने — जो कश्मीर की पहचान रहे हैं — अब सूखने की कगार पर हैं।
🌡️ तापमान चढ़ा, बारिश घटी
कश्मीर के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों जैसे गुलमर्ग और पहलगाम में तापमान वृद्धि 1°C से अधिक हो चुकी है। जलवायु बदलाव के कारण सर्दियों और वसंत में बर्फबारी और वर्षा में 60–80% की कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक असंतुलन की गंभीर चेतावनी मान रहे हैं।

❄️ कोलाहोई ग्लेशियर 24% सिकुड़ा
कश्मीर का प्रमुख कोलाहोई ग्लेशियर 1962 से अब तक 24% तक सिकुड़ चुका है। इसका सीधा असर कश्मीर के झरनों, झीलों और नदियों पर पड़ा है। अचबल का मशहूर कश्मुंड झरना पूरी तरह सूख चुका है, जो इस संकट की भयावहता को दर्शाता है।
🌪️ आपदाएं बढ़ीं, नुकसान गहरा
पिछले कुछ वर्षों में घाटी में प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं:
2017: गुरेज हिमस्खलन में 24 मौतें
2021: किश्तवाड़ में क्लाउडबर्स्ट से 26 लोगों की जान गई
2023-2025: भूस्खलन, बाढ़ और मडस्लाइड्स से सैकड़ों प्रभावित, राष्ट्रीय राजमार्ग बाधित
🌾 खेत-बाग उजड़े, पर्यटन ध्वस्त
कृषि भी इस संकट से अछूती नहीं रही। सेब, केसर और धान जैसी फसलों के लिए पानी की कमी विकराल रूप ले चुकी है। किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर जलवायु-अनुकूल विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। वहीं, बर्फ की कमी से गुलमर्ग और सोनमर्ग जैसे पर्यटन स्थल भी प्रभावित हुए हैं, जिससे स्थानीय रोजगार पर गहरा असर पड़ा है।
🔮 क्या कहता है भविष्य?
IPCC मॉडल के अनुसार, अगर यही रफ्तार रही तो 2100 तक तापमान 1.5°C से ज्यादा बढ़ सकता है और कई हिमालयी ग्लेशियर पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने चेताया है कि अब भी समय रहते नीतिगत और सामूहिक कदम नहीं उठाए गए, तो कश्मीर केवल किताबों का स्वर्ग बनकर रह जाएगा।
जल स्रोतों का संरक्षण और झरनों का पुनर्भरण
आपदा चेतावनी और लचीला बुनियादी ढांचा
जलवायु-अनुकूल कृषि मॉडल
हिमालयी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान
“हम अगर आज नहीं जागे, तो कल सिर्फ पछतावा बचेगा। कश्मीर सिर्फ एक राज्य नहीं, हमारी जलवायु चेतना का आईना है।”
