अभी वार्ता डेस्क।
बिहार में हर चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का रिवीजन यानी पुनरीक्षण एक संवैधानिक प्रक्रिया मानी जाती है। निर्वाचन आयोग दावा करता है कि यह रिवीजन मतदाता सूची को शुद्ध, त्रुटिहीन और अद्यतन रखने के लिए किया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कितनी मेल खाती है, यह बड़ा सवाल है।

✅ प्रक्रिया बनाम हकीकत
रिवीजन की प्रक्रिया कागजों पर अत्यंत पारदर्शी दिखाई देती है। बीएलओ घर-घर जाकर फॉर्म 6, 7, 8 इकट्ठा करते हैं, युवाओं के नाम जोड़ने, मृतक या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने का दावा करते हैं। परंतु जमीन पर लापरवाही, जातिवाद, रिश्वतखोरी और राजनीतिक दबाव की सच्चाई उजागर होती है।
⚠️ लापरवाही और भेदभाव
ग्रामीण क्षेत्रों में बिना सिफारिश के लोगों के फॉर्म महीनों तक लंबित रहते हैं या अस्वीकृत कर दिए जाते हैं। जीवित बुजुर्गों को मृतक बताकर नाम हटा दिया जाता है, जबकि कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के दो-दो स्थानों पर नाम होते हैं — जो फर्जी वोटिंग को बढ़ावा देता है।
🏙️ शहरी चुनौती: माइग्रेशन
शहरों में काम के लिए गए लोगों की सूची में या तो पुराना नाम रहता है या नए स्थान पर जुड़ता ही नहीं। इससे मतदाता अधिकार प्रभावित होता है।
💻 तकनीक, लेकिन पारदर्शिता नहीं
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आवेदन की सुविधा है, लेकिन OTP ना आना, फॉर्म रिजेक्ट होना आम है। बीएलओ को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलता — नतीजतन दस्तावेजों की गलतियों को सुधारने के बजाय नाम जोड़ने/हटाने की खानापूरी होती है।
🗳️ राजनीतिक संतुलन का खेल
कई रिपोर्टों के अनुसार, बीएलओ जातिगत आधार पर नाम जोड़ते या काटते हैं। इससे वोटर लिस्ट रिवीजन राजनीतिक हथियार बन जाता है — खासकर दलित और पिछड़ी जातियों के लिए ये सबसे बड़ी चिंता है।
निष्कर्ष
बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन सही भी है और गलत भी।
सही इसलिए, क्योंकि नए मतदाता जुड़ते हैं, मृतक और डुप्लीकेट नाम हटते हैं।
गलत इसलिए, क्योंकि भ्रष्टाचार, पक्षपात और तकनीकी खामियां इस प्रक्रिया की साख को कमजोर करती हैं।
जब तक इस कार्य में तकनीकी पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता नहीं आती, लोकतंत्र की यह पहली सीढ़ी सशक्त नहीं बन पाएगी।
