गोपालगंज जिले के अंतर्गत आने वाला बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र आज भी बुनियादी विकास से कोसों दूर है। जिले के पश्चिमी हिस्सों की तुलना में यह इलाका लगातार पिछड़ता गया, और दशकों से राजनीतिक आश्वासनों तथा जमीनी हकीकत के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि यहां के लोग अब “विकास” शब्द पर विश्वास करना छोड़ चुके हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति चिंताजनक है। आज तक बैकुंठपुर में एक भी ग्रेजुएट कॉलेज नहीं खुला। छात्रों को आगे की पढ़ाई के लिए गोपालगंज, छपरा या अन्य बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। लड़कियों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है — यहां की 50% से अधिक छात्राएं 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं, क्योंकि आगे की शिक्षा के लिए दूर जाना उनके लिए संभव नहीं होता। व्यावसायिक संस्थान और प्रोफेशनल कोर्स की सुविधाएं भी पूरी तरह नदारद हैं।
सड़क और बुनियादी ढांचे की हालत भी बेहद खराब है। हर 1-2 साल में आने वाली बाढ़ पूरे क्षेत्र को तहस-नहस कर देती है, और मरम्मत या पुनर्निर्माण का काम बेहद धीमी रफ्तार से होता है। सिंचाई और जल निकासी की कोई ठोस व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई है।
परिवहन की समस्या भी गंभीर है। बैकुंठपुर से दिल्ली, कोलकाता, पंजाब या अन्य बड़े शहरों के लिए आज तक कोई सीधी ट्रेन सेवा नहीं शुरू हो सकी। पिछले 10 वर्षों से सांसद और विधायक बार-बार लंबी दूरी की ट्रेन चलवाने का वादा करते रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ।
राजनीतिक इतिहास में यहां के मतदाताओं ने 40 वर्षों तक ब्रजकिशोर नारायण सिंह, देवदत्त राय, मनजीत सिंह, प्रेम शंकर राय और मिथिलेश तिवारी जैसे विधायकों पर भरोसा किया, लेकिन विकास के मोर्चे पर सभी असफल रहे। न कोई नया उद्योग, न फैक्ट्री, न ही कोई बड़ा निवेश — बैकुंठपुर पूरी तरह नजरअंदाज होता रहा।
उद्योग और रोज़गार की कमी के कारण यहां के युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा है। अधिकांश युवा पंजाब, दिल्ली, गुजरात और मुंबई जैसे राज्यों में जाकर रोज़ी-रोटी कमाने को मजबूर हैं।
बैकुंठपुर विधानसभा एक जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे दशकों से लगातार दिए जा रहे राजनीतिक वादों के बावजूद कोई क्षेत्र बुनियादी विकास से वंचित रह सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, सड़क और परिवहन — हर क्षेत्र में यह इलाका पीछे है। अगर जल्द ठोस नीतिगत हस्तक्षेप और विकास योजनाएं नहीं लाई गईं, तो आने वाले वर्षों में यह पिछड़ापन और गहरा जाएगा।
