दरभंगा की तनु प्रिया गोली कांड की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया है।
एक तरफ़ लहूलुहान बेटी के चेहरे पर अपने फैसले के प्रति अडिग विश्वास, और दूसरी तरफ़ एक पिता का चेहरा — जिसमें आंसुओं से भीगा क्रोध, पीड़ा और गहरी असहमति साफ झलक रही थी। यह घटना सिर्फ़ एक गोली चलने की ख़बर नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जो कभी पिता-बेटी के रिश्ते की सबसे मज़बूत नींव होती थी।

पिता, जिसने अपने सपनों को कुर्बान कर बेटी के सपनों को पूरा करने में सालों की मेहनत और संघर्ष झोंक दिए। जिसने उसे पढ़ाया-लिखाया, समाज में सम्मान दिलाया और हर मुश्किल से लड़कर उसका भविष्य सुरक्षित किया। लेकिन जब वही बेटी जीवन का सबसे अहम फैसला — शादी — पिता की राय के बिना कर लेती है, तो यह केवल परंपरा का टूटना नहीं, बल्कि रिश्ते के भरोसे का भी दरकना है।
बेटी को अपनी पसंद का अधिकार है — यह उसका जन्मसिद्ध हक़ है।
लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य भी आते हैं। क्या यह उसका कर्तव्य नहीं कि जीवन के अहम फैसलों में पिता का अनुभव, आशीर्वाद और सहमति शामिल हो?
आज की पीढ़ी आत्मनिर्भर है, अपने फैसलों में दृढ़ है — यह सकारात्मक बदलाव है।
लेकिन “मेरी ज़िंदगी, मेरी मर्ज़ी” की सोच अगर “हमारा परिवार, हमारी भावनाएं” से अलग हो जाए, तो यह दरार रिश्तों में दूरी और संवादहीनता पैदा कर देती है।
तनु प्रिया का मामला हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता और संस्कार में टकराव नहीं, बल्कि संतुलन होना चाहिए।
बेटी को पिता की राय सुननी चाहिए — केवल आज्ञा पालन के लिए नहीं, बल्कि अपने निर्णय को मजबूत और सुरक्षित बनाने के लिए। पिता का अनुभव कोई बंधन नहीं, बल्कि वह सुरक्षा कवच है जो हर मुश्किल में सहारा देता है।
इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी बेटियों को उनके अधिकार दें, लेकिन यह भी सिखाएं कि अधिकार के साथ रिश्तों का सम्मान और संवाद की जिम्मेदारी भी आती है।
पिता-बेटी का रिश्ता तभी सुंदर और सुरक्षित रहेगा, जब उसमें संवाद, भरोसा और सम्मान जीवित रहेंगे।
अगर यह सेतु टूट गया, तो न सिर्फ एक परिवार, बल्कि पूरा समाज अपने मूल्यों को खो देगा।
